प्रतिबिंब

रिया ने ही क्या, रिया के उम्रदराजो ने जीवन के उतार चढाव के बारे मे सुना ही था. माँ बाप ही ऐसा कवच होते हैं जो बच्चो को अहसास भी नही होने देते किसी भी बुरे वक़्त का. और यही बह कारण होता है कि हर बच्चा, अपने माँ बाप के साए मे बिताए हर पल, हर लम्हे को सॅंजो कर रखता है, वचपन के नाम पर. वह नाज़ुक उम्र होती है जहाँ रिया क्या उसके हर उम्र वाले को मान बाप का टोकना खटकता है. पर हर समझाइश् के बाद प्यार और ममत्व, जो रिया जैसे हर बच्चे पर उमड़ता है, अहसास तो केवल वे और हम ही कर सकते हैं.
हाँ, कुछ दिन पहले जब रिया अपना वचपन जी रही थी, हर एक दिन वाठ जो रही थी, अपने बड़े होने की क्योंकि रिया के हर फ़ैसले पर पैनी नज़र रखी जाती और ग़लत पाने पर समझाया जाता या दांटा भी जाता. और जब रिया उदास दिखती तो माँ बाप कहते ” तुम अभी बच्ची हो, जब बड़ी हो जाओगी तो हम खुद ही तुमसे कुछ नही कहेंगे क्योंकि हर अच्छे बुरे की समझ तुममें आ जाएगी.
आज रिया बहुत खुश थी. स्कूल और स्कूल के बाद कॉलेज. अपनी पढ़ाई पूरी कर वह अपने घर से बाहर एक महानगर में जा रही थी, अपनी व्यावसायिक जिंदगी की नीव रखने, माँ बाप के साए से दूर. घर मे सब थोड़े चिंतित भी थे अपनी जिंदगी की रेखा सीमा बढ़ाते हुए, अपने संस्कारों के बूते पर. पर प्यार और ममता जैसे कुछ भी समझने तैयार ही ना थे, रिया की तरह.
महानगर पहुँचते ही रिया की एक कमरे और कंप्यूटर की छ्होटी सी दुनिया बसने लगी. धीरे धीरे दोस्त बने. रिया को लग रहा था मानो सारी दुनिया उसकी हथेली पर आ गयी हो. खुशी के मारे जैसे रिया सब भूल गयी थी, सिवाय उन्मुक्तता के एस रूमानी अहसास के. कुछ दिनों मैं ही रिया ने शादी करने का फ़ैसला लिया और घर मे बताया. अब रिया एक पत्नी भी बन गयी थी. लद चुकी थी बह उम्मीदों के बोझ तले कभी एक कर्मचारी के रूप में, कभी एक पत्नी के रूप में तो कभी एक बाहू के रूप में. पर इन उम्मीदों को पूरा करते करते जैसे माँ बाप के प्रति अपने फ़र्ज़ तो बह भूल ही चुकी थी. ग्लानि और कुंठा से भारी रिया अंततः “आज बड़ी हो चुकी थी”.
आज रूमानी अहसासों की कटुता अनुभव कर, रिया रोना चाहती थी. पर रो कर भी क्या हासिल होता उसे, क्योंकि उसके इर्द गिर्द बैठे लोगों को ना ही उसके आँसुओं का मोल था और ना ही उसकी भावनाओं का. हर कारण नदारद था उनके लिए, जो रिया के आँसुओं की कद्र कर सकें. यह दर्द भरी चीत्कार केवल रिया ही सुन पा रही थी बस. रिया की नम पलकें और आँखों में घटाओं से उमड़ते आँसू, जैसे की हर साँस के संग बरसने का मौका ताक रहे थे, पर आँसुओं का क्या??? रुंधा हुआ गला और कड़बे से घूँट पी कर रह गई बस रिया.
घर मे मेहमानो की भीड़ ओर चहल पहल. और रिया वहीं सन्नाटा ढूँढ रही थी. मौका पाते ही रिया गुसलखाने मे गई. आईने के सामने खड़े हो कर, जैसे अपने ही प्रतिबिंब को ना पहचान पाई हो. अनजान समझ बैठी उसे. पर अनजान है तो क्या हुआ ? इंसानियत का वास्ता देकर रिया ने प्रतिबिंब से पूछना चाहा ही था “क्या हुआ तुम्हें”?? प्रतिबिंब बिफर कर रो पड़ा. रिया ने अपना हाथ बढ़ाना चाहा उसके आँसू पोंछने के लिए पर मनोभावों की गर्जना से जैसे हाथ भी कांप गये. रिया चुपचाप खड़ी प्रतिबिंब के ढहते सपने और बरसते आँसू देखती रही. रिया ने कहा ठीक है रोने से मन हल्का हो जाता है. प्रतिबिंब ने कहा “मन” ? मन तो बचा ही कहाँ है मेरा. अपना सर्वस्व बाँट कर भी प्रतिबिंब अपने दिल की व्याकुलता और ग्लानि का भार किसी से भी ना बाँट पाया.

रिया समझ रही थी “प्रतिबिंब का दर्द”. यूँ लग रहा था जैसे वह प्रतिबिंब नहीं, रिया खुद ही थी. कितनी पीड़ा और वेदना के साथ निकलते जा रहे थे आँसू और हर एक आँसू के साथ ही ओझल होता जा रहा था, हर अपना, हर प्रेमासपद प्रसंग, बड़े होने का सपना, आत्मनिर्भर बनने की चाह और उन्मुक्तता. अब जो साथ रह गया था, प्रतिबिंब और रिया के अंतर्मन में, वह थी माँ की ममता भारी गोद और पिता का स्नेहिल हृदय. वह खुश थी उनकी नज़रो के घेरे मे!!

Some typing mistakes may be there. New to hindi typer.

Thanks for hanging here.

Deepti Chaubey!!

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About Deepti

I am Deepti from Delhi, India. A Craft person, a blogger (Writer), Painter, a baby's dress designer, a daughter, elder sister of two, a wife and above all "Mother to a cute little Princess".
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